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Thursday, February 2, 2023

कैं’सर के रोगियों के लिए भगवान का रूप हैं डॉ रवि, मिल चुका है पद्मश्री सम्मान

एक चिकित्सक को हमेशा भगवान का रूप माना जाता है। और क’रोना महामारी ने इस बात को हर किसी को भलीं भांति समझा दिया है। डॉक्टर्स म’रीज़ों को एक नया जीवन देते हैं इस बात के प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। असम के कछार में कैं’सर अ’स्पताल व अनुसंधान केंद्र (सिलचर कैं’सर संस्थान) चलाने वाले 55 वर्षीय डॉ. रवि कन्नन। जिन्होंने अपने जीवन में 70 हजार से भी ज्यादा कैं’सर म’रीज़ों का इलाज कर उन्हें नया जीवन प्रदान किया है। कैं’सर के इलाज के क्षेत्र में अनमोल योगदान देने के लिए डॉ. रवि कन्नन को भारत सरकार ने पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया हैं। डॉक्टर कन्नन पहले तमिलनाडु में काम करते थे, लेकिन उन्होंने अपनी जिंदगी के अहम 13 साल असम के पिछड़े बराक वैली में गरीब कैं’सर म’रीजों के इलाज के लिए समर्पित किए हैं। जो लोग उन्हें जानते हैं या जिन लोगों का उन्होंने इलाज किया है, वह उन्हें धरती पर ईश्वर का ही स्वरूप मानते हैं। वह गरीबों के नाम अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर चुके हैं। लेकिन डॉ. रवि कन्नन के लिए अपने प्रतिष्ठित करियर को छोड़ कर गरीबों की सेवा करने का फैसला करने का निर्णय इतना आसान नहीं था। आइए जानते हैं उनके जीवन का प्रेरणादायी सफर।

एक घटना ने बदल दी डॉ. रवि कन्नन की जिंदगी

भारत और बांग्लादेश के बॉर्डर से लगा असम का एक इलाका बराक घाटी है। आजादी के कई दशक बाद भी यह इलाका मेडिकल की सुविधाओं से तकरीबन वंचित था। इलाज कराने के लिए राजधानी की गुवाहाटी जाना पड़ता था। राजधानी से इस इलाके की दूरी करीब 350 किलोमीटर है। इस इलाके में लोग तंबाकू उत्पादों का जमकर इस्तेमाल करते हैं। तंबाकू के इस्तेमाल से लोग कैं’सर जैसी जानलेवा बी’मारी की चपेट में भी आ जाते हैं। कैं’सर डॉक्टर ‘रवि कन्नन’ पहले चेन्नई के अदयार कैं’सर इंस्टीट्यूट में काम करते थे। और गेस्ट सर्जन और मोटिवेटर के तौर पर एक बार असम की यात्रा पर आए थे। उन्होंने देखा कि यहां के कैं’सर म’रीजों के मन में एक धारणा थी कि यह लाइलाज बी’मारी है। इसलिए इसके इलाज पर ज्यादा खर्च करने का कोई फायदा नहीं है। लेकिन, वह कैं’सर म’रीजों को बताना चाहते थे कि इसका भी उपचार है। वह नहीं चाहते थे कि उपचार के अभाव में कैं’सर के किसी म’रीज की मौ’त हो जाए। तब उन्होंने 2007 में यहां आने का फैसला कर लिया।

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परिवार वाले असम भेजने को नहीं थे तैयार

डॉ. रवि कन्नन असम आने से पहले चेन्नई के आदयार कैं’सर अ’स्पताल में मशहूर डॉक्टर थे। जब असम के इस अस्पताल में काम करने का ऑफर मिला तब उनके परिवार वाले तैयार नहीं थे। जिसके बाद उन्होंने काफी मशक्कत के बाद अपने परिवार को मनाया और वो असम आ गए। इसके बाद उन्होंने अ’स्पताल में काम करना शुरू कर दिया। इस दौरान उनकी पत्नी और बेटी ने स्थानीय लोगों से घुलना-मिलना शुरू कर दिया जिससे लोग उनसे आसानी के साथ अपनी परेशानियां कह सकें। उन्होंने लोगों की समस्याओं को जान उनका इलाज करना शुरू किया।

शुरूआत में कई कठिनाइयों का किया सामना

डॉ. रवि कन्नन और उनके परिवार के लिए अपना घर छोड़ असम में बसना आसान नहीं था। मूल रूप से तमिलनाडु के रहने वाले कन्नन और उनके परिवार के लिए यहां का मौसम, भाषा और लोग बिल्कुल अलग थे। उनकी परेशानियां सिर्फ इतनी ही नहीं थी। पहले दिन से ही उन्हें अ’स्पताल में स्टाफ की कमी से लेकर फंड, मशीन सभी बातों से उन्हें जूझना पड़ा। लेकिन वक्त गुजरने के साथ कन्नन लगातार रहे और जिस अ’स्पताल में 2007 में सिर्फ 23 स्टाफ था वहां आज 200 से ज्यादा स्टाफ हैं। 25 बेड के अ’स्पताल से अब यह 100 बेड का अ’स्पताल बन चुका है।

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म’रीज के साथ हुई घटना ने दी निःशुल्क इलाज करने की प्रेरणा

डॉक्टर रवि कन्नन की जिंदगी में प्रेरक मोड़ तब आया जब उन्होंने देखा कि कैं’सर के इलाज के लिए रो’गी को बार-बार लगातार डॉक्टर के संपर्क में रहना पड़ता है। एक बार एक म’रीज उनके पास आया और इलाज के 5,000 रुपये देकर लौटा तो फिर कभी वापस नहीं आया। जबकि, कैं’सर के इलाज के लिए फॉलोअप बहुत ही जरूरी है। बाद में उन्हें पता चला कि उस मरीज ने जो 5,000 रुपये इलाज के लिए दिए थे, उसकी एवज में उसने एक अमीर आदमी के हाथों अपने बेटे को बेच दिया था। इस भयावह अनुभव ने उनकी जिंदगी बदल दी। उन्होंने किसी तरह से उस इंसान को उसका बच्चा वापस दिलाया और फिर गरीबों के इलाज के लिए क्रांतिकारी उपाय की शुरुआत कर दी।

हर साल 3 हजार से 14 हजार म’रीज़ों का करते हैं निःशुल्क इलाज

डॉ. रवि कन्नन की मेहनत का नतीजा है कि एक छोटा अ’स्पताल आज बड़े कैं’सर हॉ’स्पिटल में तब्दील हो चुका है। वर्तमान समय में अ’स्पताल में हर साल 3000 से 14000 हजार तक म’रीज आते हैं। इस अस्पताल में अब दूसरे राज्यों से म’रीज भी इलाज कराने आते हैं। इसका एक कारण ये भी है कि इस अ’स्पताल में कैं’सर का इलाज का खर्च बहुत कम है। अब अ’स्पताल को कई जगहों से फंड प्राप्त होता है। साल 2011 में इंडो अमेरिकन कैं’सर एसोसिशन ने अ’स्पताल में एक नया डिपार्टमेंट खुलवाने में मदद की थी। इलाज के जरूरी दवाएं भी अ’स्पताल ही मुहैया कराता है। ये दवाएं बहुत कम दाम पर दी जाती हैं। कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं की मदद से अब यहां पर एक उम्दा आईसीयू यूनिट भी शुरू की जा चुकी है। अ’स्पताल अब एक नया ब्लड बैंक खोलन की तैयारी भी कर रहा है। जिसकी परमिशन मिलना बाकी है।

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कर चुके हैं 70 हजार से अधिक म’रीजों का इलाज

डॉ. रवि कन्नन अब तक बराक वैली में 70,000 से ज्यादा कैं’सर म’रीजों का मुफ्त इलाज कर चुके हैं। वह सिर्फ कैं’सर म’रीजों का इलाज ही नहीं करते, उनके ठहरने, खाने-पीने और उनके अटेंडेंट्स के लिए रोजगार का भी इंतजाम करते हैं। उनकी मेहनत और लगन का नतीजा है कि एक ग्रामीण कैं’सर सेंटर करीब एक दशक में एक पूर्ण कैं’सर अस्पताल और रिसर्च सेंटर के रूप में तब्दील हो चुका है। उन्होंने कैं’सर के आसानी से और सुविधाजनक उपचार के लिए कई तरह के सफल इनोवेटिव प्रयोग भी किए हैं।

सरकार ने किया पद्मश्री सम्मान से सम्मानित

2007 में जब डॉक्टर रवि कन्नन अपने परिवार के साथ चेन्नई से बराक वैली शिफ्ट हुए थे। तब वहां एक छोटी सी कछार कैं’सर हॉ’स्पिटल सोसाइटी थी, जो वित्तीय और डॉक्टरों की संकट झेल रही थी। आज की तारीख में इस अ’स्पताल में सालाना 20,000 म’रीजों का इलाज हो रहा है। म’रीजों के तीमारदारों के लिए रोजगार पैदा किया जा रहा है। म’रीजों को मुफ्त और उनके परिवार वालों को मामूली कीमतों पर खाना उपलब्ध कराया जा रहा है। डॉक्टर रवि कन्नन के इसी सेवाभाव को देख भारत सरकार ने उन्हें देश के सर्वोच्च सम्मान में से एक पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया है।

कैं’सर म’रीज़ों का निःशुल्क इलाज करने वाले डॉक्टर रवि कन्नन आज सही मायने में लाखों लोगों के लिए प्रेरणा बन चुके हैं। उन्होंने अपने सेवाभाव से अपनी सफलता की कहानी लिखी हैं। आज वह लोगों के लिए एक मिसाल बन चुके हैं।

Sunidhi Kashyap
Sunidhi Kashyap
सुनिधि वर्तमान में St Xavier's College से बीसीए कर रहीं हैं। पढ़ाई के साथ-साथ सुनिधि अपने खूबसूरत कलम से दुनिया में बदलाव लाने की हसरत भी रखती हैं।

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