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Wednesday, February 8, 2023

पेशे से हैं गार्ड और 5000 से अधिक शहीदों के परिवार को लिख चुके हैं ख़त, देश के सपूतों को दिल में जिंदा रखते हैं जितेंद्र

हमारे आसपास में जो घटनाएं होती है हम उन्हें कितने दिनों तक याद रख पाते हैं? अधिक से अधिक 1-2 सप्ताह या 1-2 महीने। बस। किसी सैनिक के शहीद होने से लेकर किसी मासूम जानवर के साथ कोई घटना होना, यह सभी बातें सिर्फ कुछ ही दिनों तक लोगों के बीच चर्चा में रहती है।

लेकिन राजस्थान के भरतपुर जिले के निवासी जितेंद्र सिंह देश के लिए कुर्बानी देने वाले जवानों को हमेशा अपने दिल में जिंदा रखते है। वे कई शहीद जवानों के घरवालों को चिट्ठी लिखते हैं, फोन द्वारा बातें करते हैं और कुछ जवानों की मूर्तियां भी बना रखी है। गूगल से भी अधिक शहीद जवानों की जानकारी उनके पास है। उन्होंने कुल 5171 शहीद जवानों की जानकारी एकत्रित कर रखी है। जितेंद्र के पास हमारे देश के लिए जान देने वाले जवानों के फोटो के साथ उनके घर का पता भी है

राजस्थान के हैं जितेंद्र

जितेंद्र का कहना है वे कि राजस्थान के भरतपुर जिले से आते है। उन्हें शुरू से ही देश के लिए जान देने वाले जवान अपने आसपास मिलते थे। इस इलाके के ज्यादातर युवा अंग्रेज़ो के समय से ही फौज में भर्ती हुआ करते है। जितेंद्र के पिता भी एक सैनिक थे। जितेंद्र बताते हैं कि 1999 के कारगिल युद्ध में बहुत सारे जवान शहीद हो गए थे। 13-14 जवान जितेंद्र के गांव के ही थे।

जवानों की शहादत ने जितेंद्र के अंदर देशभक्ति जगा दी

जितेंद्र जवानों की देशभक्ति और तिरंगे में लिपटा उनका शरीर देख काफी प्रेरित हुए। इसी बीच एक जवान के मृत शरीर को जब उसके घर लाया गया तो उस शहीद के पिता ने कहा “बेटा गया तो क्या देश तो सलामत है”। इन पंक्तियों ने जैसे जितेंद्र के अंदर देशभक्ति की भावना जगा दी हो। उन्होंने सोचा कि यह अद्भुत इतिहास है, जिसे संजो कर रखा जाना चाहिए। इसके बाद उन्होंने शहीदों की जानकारियां जुटानी शुरू कर दी। और उनके पास अंग्रेजों के समय से अब तक 5000 से अधिक जवानों की जानकारियां है। 150 से ज्यादा जवानों की मूर्तियां बना चुके हैं और 11 क्विंटल ऐसे कागज उनके पास है जिसमें केवल शहीदों की जानकारियां है। कारगिल का युद्ध हुआ तो मोबाइल फोन नहीं था। उस समय जवान अपने घर वालों का हाल समाचार चिट्ठियां द्वारा ही पता करते थे। जब तक चिट्ठियां जवानों के घर तक पहुंचती। जवानों का अंतिम संस्कार हो चुका था, उनके घर वालों को राहत तक मिलना शुरू हो चुका था। एक शहीद जवान ने अपनी अंतिम चिट्ठी में लिखा था “पिता जी मैं यहां अच्छा हूं, आप भी ठीक है यह लिखना”। इस चिट्ठी को पढ़कर सबकी आंखें नम हो गई।

जितेंद्र ने बदल ली अपनी ज़िंदगी

तभी से जितेंद्र ने यह ठान लिया कि शहीद जवानों की यह आखिरी चिट्ठी नहीं है। इनके परिजनों को मैं हमेशा लिखता रहूंगा। जितेंद्र 15 पैसे के जमाने से ही शहीद परिवार को चिट्ठियां लिखते आ रहे हैं। और इनका सीधा संपर्क देश के 5171 शहीद जवानों के परिवारों से है। शहीद परिवार वाले भी यह जानकर खुश होते हैं कि उन्हें आज भी याद किया जा रहा है। क्योंकि 1962, 1965, 1975 के शहीद जवानों का नाम और गांव भी लोगों को याद नहीं है।

कैसे शुरू किया चिट्ठी लिखना

वर्ष 2000 में कारगिल में शहीद जवानों को श्रद्धांजलि दी गई और कारगिल विजय दिवस भी मनाया गया। तो उन्होंने भी शहीद जवानों को श्रद्धांजलि देने के बारे में सोचा। जितेंद्र गांव के बस अड्डे पर शहीद जवानों की फोटो लगाकर खड़े रहे। उनके पास मोमबत्ती और फूल खरीदने के भी पैसे नहीं थे। सभी लोग कारगिल युद्ध को भूलकर अपने दुनिया में लौट चुके थे। जितेंद्र अकेले ही फोटो के साथ खड़े रहे। रात के 11 बजे तक लोगों का इंतजार करते रहे लेकिन श्रद्धांजलि देने के लिए कोई नहीं आया। फिर सभी जवानों की फोटो लेकर घर आ गए। लेकिन कुछ समय के बाद लोग शहीदों को श्रद्धांजलि देने आने लगे। उस गांव के लोगों ने शहीदों के सम्मान में उस स्थान का नाम कारगिल चौक रख दिया एवं जितेंद्र का नाम मेजर साहब रख दिया।

पैसे की रहती है तंगी

वर्ष 2004 में पोस्टकार्ड का दाम बढ़ने पर प्रधानमंत्री को पोस्टकार्ड का दाम न बढ़ाने के लिए एक पत्र लिखा। लेकिन इस पर कोई सुनवाई नहीं हुआ। जितेंद्र 2008 में सूरत आकर एक प्राइवेट स्कूल में 10000 रुपये के मासिक वेतन पर गार्ड की नौकरी करने लगे। जो कि इस इस करो’ना काल में घटकर 5000 हो गई है।

बजाज वालों ने इन्हें शहीदों के परिवार से मिलवाया

“कारगिल अनटोल्ड- स्टोरी” मे इनके बारे में खूब चर्चा की गई है। बजाज कंपनी वाले भी जब इनके गांव आए और इनके सारे फोटो और मूर्तियां देखी तो वह उनसे काफी प्रभावित हुए। ‌उन्होंने जितेंद्र से उनकी इच्छा पूछी तो उन्होंने कहा “मुझे कुछ नहीं चाहिए। मुझे शहीद जवानों के घरवालों से मिलना है। वे मुझे लंबे समय से मिलने के लिए बुला रहे हैं, लेकिन मैं असमर्थ हूं।” फिर बजाज वालों ने उन्हें शहीद परिवारों से मिलवाने का खर्च उठाया।

आंखों की रौशनी भी कम हो गयी है

शहीद परिवारों को पत्र लिखते- लिखते जितेंद्र को लगभग 21 साल हो गए हैं। जितेंद्र के बारे में लोग कहने लगे‌ हैं कि “यह इंसान पागल हो चुका है।” शहीदों को पत्र लिखते- लिखते जितेंद्र की आंख भी खराब हो गई है। उन्हें देखने में काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है।

अक्षय कुमार भी कर चुके हैं सम्मानित

जितेंद्र के अंदर देश भक्ति भावना इतनी थी कि उन्होंने अपने बेटे का नाम भी एक शहीद जवान के नाम पर ही रखा। उनका सपना था कि ऐसा हॉल बनवाए, जिसमें शहीद जवानों की फोटो और नाम अंकित कर सके। अक्षय कुमार ने जितेंद्र को सम्मानित करते हुए कहा कि जितेंद्र के जीवन पर एक फिल्म बननी चाहिए। और उम्मीद है कि इससे हमारे देशवासियों के अंदर देशभक्ति की भावना जागृत होगी।

हम जितेंद्र द्वारा किये जा रहे इस कार्य की सराहना करते हैं। आप भी इस पोस्ट को अधिक से अधिक शेयर करें जिससे जितेंद्र को उचित पहचान मिल सके और उनकी मदद हो सके।

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