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Thursday, February 2, 2023

लोगों ने उड़ाया मजाक, फिर भी दोनों पैर से दिव्यांग गेनाभाई पटेल ने खेती में कायम की मिसाल,

जिंदगी में हर किसी को मुक़म्मल जहां नहीं मिलता। लेकिन हिम्‍मत हो, तो इंसान अपनी किस्‍मत खुद लिखता है। यह पंक्तियां गेनाभाई दर्गाभाई पटेल के जीवन पर एकदम सटीक बैठती हैं। गुजरात के रहने वाले गेनाभाई पटेल एक ऐसी शख्सियत हैं, जिन्होंने अपनी कमजोरियों पर रोने की बजाय उसे अपनी ताकत बनाया। पो’लियोग्रस्त, दि’व्यांग होने के बाद भी गेनाभाई दर्गाभाई पटेल ने हार नहीं मानी और गुजरात में अनार की खेती की। अनार की खेती करने से उन्होंने अपने गांव की पूरी सूरत ही बदल कर रख दी। जिसके फलस्वरूप भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया है।

दोनों पैर से असमर्थ होने के बाद भी भी खेती कर मिसाल कायम करने करने का सफर गेनाभाई दर्गाभाई पटेल के लिए इतना आसान नहीं था। इसके लिए उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा। आइए जानते हैं उनके जीवन का संघर्ष से सफलता का प्रेरणादायी सफर।

पैर से नाकाम होने के बाद भी नहीं खोया हौसला

गेनाभाई दर्गाभाई पटेल का जन्म गुजरात के बनासकांठा जिले के सरकारी गोलिया गांव में हुआ था। बचपन से ही उनके दोनों पांव पो’लियो से ग्रस्त थे। उनके पिता एक पारंपरिक किसान थे। बचपन में उनके भाई खेतों में पिताजी का हाथ बंटाते थे। लेकिन पैरों से असमर्थ होने के कारण गेनाभाई के पिताजी को लगता था कि वह खेती में उनकी मदद नहीं कर सकते। इसलिए वह चाहते थे कि वह अपनी पढ़ाई पूरी करें। उनके परिवार में माता-पिता अशिक्षित थे लेकिन फिर भी वह गेनाभाई को पढ़ाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने बहुत कम उम्र में ही गेनाभाई दर्गाभाई पटेल को गांव से 30 किलोमीटर दूर एक हॉस्टल में भेज दिया। जहां से वह अपने तिपहिया साइकिल से स्कूल जा सकते थे।

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पढ़ाई पूरी करने के बाद आया खेती करने का विचार

12वीं तक की पढ़ाई पूरी करने के बाद गेनाभाई गांव लौट आए। किसी को समझ नहीं आ रहा था कि वह अब आगे क्या करेंगे? लेकिन गेनाभाई के मन में कुछ और ही चल रहा था। वह भी भाई-बहनों की तरह खेती में माता-पिता का हाथ बंटाना चाहते थे। लेकिन दिव्‍यांग होने के कारण वह कुछ भी करने में असमर्थ थे। लेकिन तभी उन्‍हें समझ आया कि वह ट्रैक्‍टर चलाना सीख सकते हैं। उनके पिता गेंहू, बाजरा जैसी फसलें उगाया करते थे। उस समय बोरवेल की मदद से सिंचाई करके खेती होती थी, जिसमें पानी की बहुत बर्बादी होती थी।

अच्छा ट्रैक्‍टर ड्राइवर बनने के साथ ऐसे मिला खेती का आइडिया

गेनाभाई खेती करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने ट्रेक्टर चलाना सीखा। वह कुछ समय में ही एक अच्‍छे ट्रैक्‍टर ड्राइवर बन गए। गेनाभाई कुछ ऐसा उगाना चाहते थे, जिससे आमदनी बढ़े और एक बार बुआई करने के बाद लंबे समय तक उपज मिले। इसलिए वह ऐसी फसल की खोज में जुट गए, जिसे दिव्यांग होने के बावजूद वो आसानी से उगाया जा सजता था। इस क्रम में उन्होंने कई फसलों पर हाथ आजमाया। फिर अन्य विकल्प की तलाश में वह स्थानीय कृषि अधिकारी से मिले। कृषि विश्वविद्यालयों का दौरा किया और कृषि मेले में भी गए। करीब तीन महीने तक गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान में घूमते रहे। जिसके बाद उन्‍होंने महाराष्‍ट्र में अनार की खेती होते देखी और यहीं से उन्होंने इसकी खेती करना का फैसला कर लिया।

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लोगों ने उड़ाया मजाक फिर भी नहीं मानी हार

साल 2004 में गेनाभई महाराष्ट्र से 18,000 अनार के पौधे लेकर अपने गावं आए। भाई-बहनों से मदद मांगी और खेतों में अनार बो दिए। गांव के दूसरे किसानों को यह समझ नहीं आ रहा था, कि वह क्या कर रहे हैं। क्‍योंकि किसी ने इससे पहले कभी अनार की खेती नहीं की थी। लोग उन पर हंस रहे थे, उनका मजाक बना रहे थे। कुछ ने कहा कि उनका दिमाग फिर गया है इत्यादि। लेकिन गेनाभाई को यकीन था कि उनकी जमीन पर अनार उग सकते हैं। उनके भाई और भतीजों ने उन पर भरोसा किया और इस काम में उनका पूरा सहयोग दिया।

ऐसे मेहनत लाने लगी रंग

वर्ष 2007 में गेनाभाई की मेहनत का रंग दिखने लगा। उनके अनार में फल आने लगे। लेकिन इन फलों को बेचना अब भी बड़ी चुनौती थी। क्योंकि पूरे राज्य में अनार का बाजार नहीं था। उन्होंने अनार उगाने वाले अन्य किसानों को संगठित किया और ट्रकों में अनार लादकर जयपुर, दिल्ली के बाजारों में उन्हें बेचने की व्यवस्था की। हालांकि यह ज्यादा दिन नहीं चल पाया। वह सीधे उपज खरीदने वाले व्यापारियों की तलाश में थे। लेकिन व्यापारी उनसे तभी फल खरीदते, जब उन्हें यह भरोसा होता कि उनके पास फल पर्याप्त मात्रा में हैं। इसलिए उन्होंने एक योजना के तहत हरेक किसान को अलग-अलग खेतों में बैठने के लिए कहा और व्यापारियों को एक ही खेत कई बार दिखाया। व्यापारियों को लगा कि उनके पास काफी मात्रा है और इस तरह उन्हें उनका पहला ऑर्डर मिला।

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ज्यादा मुनाफा देख अन्य किसान भी हुए प्रेरित

अनार की खेती से गेनाभाई पटेल को अपनी लागत के मुकाबले दस लाख रुपये से अधिक का मुनाफा हुआ। उनकी सफलता देखकर और भी किसान पारंपरिक खेती छोड़कर बागवानी करने लगे। जिसके बाद गेनाभाई पटेल ने अन्य किसान भाइयों के लिए वर्कशॉप का भी आयोजन करवाया। जिसमें कई कृषि वैज्ञानिक और जानकार आए थे। अब उनके जिले से दुबई, श्रीलंका और बांग्लादेश में अनारों का निर्यात होता है।

प्रधानमंत्री की प्रशंसा के साथ मिला पद्मश्री सम्‍मान

गेनाभाई पटेल ने अपने कार्यों से अपने गांव की पूरी दशा ही बदल कर रख दी। गेनाभाई के गांव के लोग अब अपने अनार की फसल दुबई, श्रीलंका और बांग्लादेश तक निर्यात करते हैं। खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी गेनाभाई के परिश्रम को प्रणाम किया। उन्‍होंने अपने भाषण में गेनाभाई का जिक्र किया है। अपने गांव की किस्मत बदलने वाले गेनाभाई पटेल को को अभी तक 18 से भी अधिक राज्य-स्तरीय पुरस्कार और कई राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुके हैं। यही नहीं उन्हें भारत सरकार ने पद्मश्री सम्मान से भी सम्मानित किया है।

अपनी कमजोरियों को अपनी ताकत बनाने वाले गेनाभाई दर्गाभाई पटेल आज लाखों लोगों के लिए प्रेरणा है। उन्होंने अपनी मेहनत और लगन के दम पर अपनी सफलता की कहानी लिखी है।

Medha Pragati
Medha Pragati
मेधा बिहार की रहने वाली हैं। वो अपनी लेखनी के दम पर समाज में सकारात्मकता का माहौल बनाना चाहती हैं। उनके द्वारा लिखे गए पोस्ट हमारे अंदर नई ऊर्जा का संचार करती है।

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