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Monday, January 30, 2023

मीराबाई चानू: लकड़ी का गट्ठर उठाते-उठाते कैसे करोड़ों भारतीयों के दिल में बस गईं

बेटियां अगर कोशिश करें तो वह कभी हार नही सकती। टोक्यो ओलंपिक में भारत को पहला सिल्वर पदक दिलाने वाली मीराबाई चानू के जीवन पर यह लाइन एकदम सटीक बैठता है।

साइखोम मीराबाई चानू कभी अपने घर के लिए लकड़ियां बीनने का काम किया करती थीं। और आज उन्होंने टोक्यो ओलंपिक में सिल्वर पदक जीतकर नया इतिहास रच दिया है। मीराबाई चानू ने मात्र 12 साल की उम्र में ही ज्यादा वजन उठाकर अपने हुनर का परिचय दे दिया था। क्योंकि तब वह अपने बड़े भाई से अधिक लकड़ी आसानी से उठा लेती थी। जंगल से यह लकड़ी वह जलावन के लिये इकट्ठा करती थीं। लेकिन बचपन से उनका यह अभ्यास आखिर में उनके काम आया और वह देश की चोटी की भारोत्तोलक बन गयीं।

बहुत कम लोग जानते हैं कि रियो ओलंपिक में लचर प्रदर्शन के बाद वेटलिफ्टर मीराबाई चानू की आलोचना हुई थी। लेकिन उन्होंने अपनी आलोचनाओं को अपना जुनून बनाया और आज इस 23 वर्षीय खिलाड़ी ने भारत का नाम रोशन किया है। मणिपुर के एक छोटे से गांव से निकलकर ओलम्पिक तक का सफर तय करना साइखोम मीराबाई चानू के लिए इतना आसान नहीं था। आइए जानते हैं उनके बारे में।

बचपन में ही दिख गई थी वेटलिफ्टिंग की प्रतिभा

8 अगस्त 1994 को मणिपुर के इम्फाल से 20 किमी दूर नोंगपोक काकचिंग गांव में एक गरीब परिवार में जन्मी साइखोम मीराबाई चानू छह भाई बहनों में सबसे छोटी हैं। वह बचपन में अपने चार साल बड़े भाई सैखोम सांतोम्बा मीतेई के साथ पास की पहाड़ी पर लकड़ी बीनने जाती थी। एक दिन उनका भाई लकड़ी का गठ्ठर नहीं उठा पाया। लेकिन मीरा ने उसे आसानी से उठा दिया और वह उसे लगभग दो किमी दूर हमारे घर तक ले आई। तब वह 12 साल की थी। जिसे देख उनके घर वालों को पता लग गया कि मीराबाई चानू में खास प्रतिभा छिपी है। जिसके बाद मीराबाई भारोत्तोलन यानि वेटलिफ्टिंग से जुड़ गयी।

बाँस से ही की वेटलिफ्टिंग का किया अभ्यास

साइखोम मीराबाई चानू बचपन से ही होशियार थी। उन दिनों मणिपुर की ही महिला वेटलिफ़्टर कुंजुरानी देवी स्टार थीं और एथेंस ओलंपिक में खेलने गई थीं। बस वही दृश्य छोटी मीरा के ज़हन में बस गया और मीराबाई ने वेटलिफ़्टर बनने की ठान ली। मीरा की ज़िद के आगे माँ- बाप को भी हार माननी पड़ी। 2007 में जब प्रेक्टिस शुरू की तो पहले-पहल उनके पास लोहे का बार नहीं था तब वह बाँस से ही प्रेक्टिस किया करती थीं। गाँव में ट्रेनिंग सेंटर नहीं था तो 50- 60 किलोमीटर दूर ट्रेनिंग के लिए जाया करती थीं।

जानिए क्या लेती थीं डाइट

डाइट में रोज़ाना दूध और चिकन चाहिए था। लेकिन एक आम परिवार की मीरा के लिए वह मुमकिन न था। उन्होंने इसे भी आड़े नहीं आने दिया। 11 साल में वह अंडर-15 चैंपियन बन गई थीं और 17 साल में जूनियर चैंपियन। जिस कुंजुरानी को देखकर मीरा के मन में चैंपियन बनने का सपना जागा था। अपनी उसी आइडल के 12 साल पुराने राष्ट्रीय रिकॉर्ड को मीरा ने 2016 में 192 किलोग्राम वज़न उठाकर तोड़ दिया।

रियो ओलंपिक में जीत का सपना रह गया था अधूरा

2016 भारत की वेटलिफ़्टर साइखोम मीराबाई चानू के लिए मुश्किल भरा था। ओलंपिक में अपने वर्ग में मीरा सिर्फ दूसरी खिलाड़ी थीं जो वेटलिफ्टिंग नहीं कर पाई। इस समय कई लोगों ने मीराबाई के प्रदर्शन की आलोचना की थी। यहाँ तक कि वह डिप्रेशन में भी चली गईं और उन्हें हर हफ्ते मनोवैज्ञानिक के सेशन लेने पड़े। इस असफलता के बाद एक बार तो मीरा ने खेल को अलविदा कहने का मन बना लिया था। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में जबरदस्त वापसी करी।

अपनी गलतियों से सीख कर रच दिया इतिहास

महज 4 फुट 11 इंच की साइखोम मीराबाई चानू 48 किलोग्राम के अपने वज़न से क़रीब चार गुना ज़्यादा वज़न यानि 194 किलोग्राम उठाकर 2017 में वर्ल्ड वेटलिफ़्टिंग चैंपियनशिप में गोल्ड जीता। जिसके बाद उनका मनोबल बढ़ गया। अपनी पिछली गलतियों से सीखकर मीरा चानू ने जबरदस्त बाउंस बैक किया। उन्होंने 2021 में जापान के टोक्यो में आयोजित हुए ओलंपिक में 49 किलोग्राम भार में सिल्वर पदक जीतकर भारत का नाम रोशन कर दिया है। यही नहीं वर्ल्ड चैंपियनशिप के अलावा, मीराबाई ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स में भी सिल्वर मेडल जीत चुकी हैं।

वज़न बनाए रखने के लिए नहीं खाया खाना

48 किलोग्राम का वज़न बनाए रखने के लिए मीरा ने उस दिन खाना भी नहीं खाया था। इस दिन की तैयारी के लिए साइखोम मीराबाई चानू पिछले साल अपनी सगी बहन की शादी तक में नहीं गई थीं। भारत के लिए पदक जीतने वाली मीरा की आँखों से बहते आँसू उस दर्द के गवाह थे जो वो 2016 से झेल रही थीं। उन्होंने अपने प्रदर्शन से सभी आलोचकों को जवाब दे दिया है।

पद्मश्री सहित कई सम्मान से हो चुकी हैं सम्मानित

साइखोम मीराबाई चानू अपने शानदार प्रदर्शन के लिए कई सम्मान से सम्मानित हो चुकी हैं। इनको भारत सरकार द्वारा “पद्मश्री” से सम्मानित किया गया था। इसके साथ ही राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार भी इन्हें दिया गया है।

साइखोम मीराबाई चानू ने मणिपुर के साथ- साथ पूरे भारत का नाम विश्व भर में रोशन किया है। आज पूरे भारत को मीराबाई चानू पर गर्व है।

Sunidhi Kashyap
Sunidhi Kashyap
सुनिधि वर्तमान में St Xavier's College से बीसीए कर रहीं हैं। पढ़ाई के साथ-साथ सुनिधि अपने खूबसूरत कलम से दुनिया में बदलाव लाने की हसरत भी रखती हैं।

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