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Wednesday, May 31, 2023

बिहार के एक गाँव से फिल्मी दुनिया की चकाचौंध तक, पढ़ें कैसा रहा है पंकज त्रिपाठी का सफर

कामयाब व्यक्ति अपनी सफ़लता के रास्ते में आने वाले हर कठिनाइयों का सामना कर के अपना मुक़ाम हासिल करता है। हमारे पसंदीदा कलाकार पंकज त्रिपाठी ने भी खूब संघर्ष किया, तब कहीं जाकर उन्हें सफलता मिली।

पंकज त्रिपाठी को आज के समय में अपना पहचान देने की जरूरत नहीं पड़ती है। वह अपने जबरदस्त एक्टिंग के कारण हर ज़गह जाने जाते हैं। मूलतः बिहार के रहने वाले पंकज त्रिपाठी का जन्म 5 सितंबर 1976 को एक किसान परिवार में हुआ था। उनकी परवरिश गांव में ही हुई। पंकज को बचपन से ही फ़िल्म, नाटक देखना बहुत पसंद था। जब वह 12वीं में थे तभी साईकिल से नाटक देखने जाया करते थे।

उन्हें नाटक देखना इतना पसंद था कि अगर नाटक पटना में होता था तब भी वे साईकिल से नाटक देखने गोपालगंज से पटना पहुँच जाते थे। एक बार तो ‘अंधाकानून’ नाटक में प्रणीता जायसवाल की बेहतरीन एक्टिंग को देख कर वो काफी इमोशनल भी हो गए थे। इसके बाद उनपर एक्टिंग का शुरुर ऐसा चढ़ा कि वो गांव के ही छोटे-छोटे रंगमंचों के सहारे लोगो को अपनी एक्टिंग दिखाने लगे। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि अपने गाँव में होने वाले अधिकतर रंगमंचों में वह महिला का किरदार ही निभाते थे। वैसे यह सब इतना आसान भी नहीं था, किसान परिवार से होने के कारण उन्हें खेती में अपने पिताजी का हाथ भी बटाना पड़ता था।

कुछ दिनों बाद पंकज आगे की पढ़ाई के लिए पटना आ गए। लेकिन उनके मन में तो एक्टिंग बसा हुआ था। पटना में भी पंकज की मुश्किलें कम नहीं हुई। एक्टिंग के साथ साथ उन्होंने होटल में रसोइए का भी काम किया। वो रात के 11 बजे से सुबह 7 बजे तक होटल के किचन में काम करते थे और दिन में 5 घंटे सोने के बाद 2 बजे से 5 बजे तक थियेटर में काम करते थे। उन्हें पता था कि उनके पिता उन्हें एक्टिंग सीखने के लिए इतने पैसे नहीं देंगे इसीलिए वह इतनी मेहनत किया करते थे।

इसके बाद उन्होंने National school of drama में दाखिला लेना चाहा लेकिन दाखिला लेने से पहले ग्रेजुएशन की योग्यता होनी चाहिए थी। अपने सपने के बीच आने वाली इस छोटी सी बाधा को पार करने के लिए उन्होंने हिंदी लिट्रेचर से ग्रेजुएशन किया। पंकज अपने जीवन के सभी मुश्किलो का सामना कर आगे बढ़ते रहे।

उनके दृढ संकल्प ने उन्हें सारी मुसीबतों का सामना करके आगे बढ़ने का हिम्मत दिया। पंकज त्रिपाठी अपने कॉलेज के दिनों में ABVP (अखिल भारतीय विधार्थी परिषद) का हिस्सा थे इसके कारण उन्हें जेल भी जाना पड़ा था। यह उनके जीवन का एक अनोखा अनुभव था।

National school of drama पास करके 16 अक्टूबर 2004 को पंकज मुम्बई चले गए। पंकज दिल्ली से मुम्बई 46 हज़ार रुपये ले कर गए थे जो दिसंबर तक खर्च हो गया। एक समय उनकी जेब में सिर्फ 10 रुपये बचे थे। फिर भी उन्होंने मुंबई में किसी तरह गुज़र-बसर किया और लगातार ऑडिशन देते रहे।

2012 में पहली बार पंकज की एक्टिंग की खूब सराहना हुई। उनकी फ़िल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ खूब सफल रही। इसके बाद तो फिर पंकज ने पीछे मुड़ के नहीं देखा। फ़िल्म दर फ़िल्म पंकज की एक्टिंग काबिलेतारीफ रही। “मिर्ज़ापुर” के कालीन भैया से तो वो इतने फेमस हुए कि असल जिंदगी में भी लोग उन्हें कालीन भैया ही बुलाने लगे।

एक छोटे से गाँव से निकलकर पंकज त्रिपाठी ने अपने टैलेंट के दम पर जो सफलता पाई है वह काबिलेतारीफ है। हम उनके उज्जवल भविष्य की कामना करते हैं। इस पोस्ट को शेयर करके पंकज के इस संघर्ष की कहानी को घर-घर तक ज़रूर पहुंचाएं।

Sunidhi Kashyap
Sunidhi Kashyap
सुनिधि वर्तमान में St Xavier's College से बीसीए कर रहीं हैं। पढ़ाई के साथ-साथ सुनिधि अपने खूबसूरत कलम से दुनिया में बदलाव लाने की हसरत भी रखती हैं।

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