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Wednesday, February 8, 2023

थाने-कचहरी का चक्कर लगाते रहे, पिता को नहीं मिला न्याय, सिस्टम बदलने के लिए बनें IPS

कई बार हमें कोई कानून सही नहीं लगता। हम उस कानून को बदलना चाहते हैं पर उस कानून को बदलने का अधिकार हमारे पास नहीं होता है। हम उस कानून को मानने के लिए विवश हो जाते हैं। लेकिन हमारे देश में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अपनी मेहनत के बदौलत अधिकारी बनते हैं और फिर उस कानून में ज़रूरी परिवर्तन करते हैं। आज हम आपको एक ऐसे ही शख्स की कहानी बताएंगे जो अपने पिता को न्याय दिलाने के लिए IPS अफसर बनें।

मिलिए IPS सूरज से

सूरज उत्तर प्रदेश के जौनपुर के रहने वाले हैं। वे पढ़ाई में बचपन से ही अच्छे थें। पढ़ाई में अच्छे होने के कारण बचपन से ही उन्हे उनके परिवार का हर क्षेत्र में समर्थन मिला। सूरज को बचपन से ही साइंस विषय पढ़ने में बहुत मन लगता था इसलिए सूरज ने अपनी मनचाही पढ़ाई की। उन्होंने साइंस विषय से ही 12वीं की पढ़ाई इलाहाबाद से पूरी की।

संघर्षों का रहा है जीवन

वो 12वीं करने के बाद इंजीनियरिंग करना चाहते थे। इसीलिए उन्होंने इलाहाबाद के मोतीलाल नेहरू इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला लिया। लेकिन दाखिला लेने के 1 महीने बाद ही उनके पिताजी गुज़र गए। यह मामला पुलिस तक पहुंच गया। सूरज ने जब स्वयं ही इस मामले की छान-बीन की तो उन्हें लगा कि उनके पिताजी को न्याय नहीं मिल पा रहा है। सूरज पुलिस की लापरवाही को प्रतिदिन देख रहे थे। थक-हारकर उन्होंने अपने पिता को न्याय मिलने की उम्मीद भी छोड़ दी।

पुलिस की लापरवाही के कारण IPS बनने की ठानी

सूरज जब पुलिस को ऐसे लापरवाही बरतते देखते थे तब उन्हें अच्छा नहीं लगता था। तभी उन्होंने यूपीएससी परीक्षा पास कर IPS बनने का निश्चय कर लिया। वो अपनी ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी कर यूपीएससी की तैयारी करने दिल्ली चले गए। वहां वे पहले प्रयास में प्री भी क्लियर नही कर पाए। दूसरे प्रयास में भी वे सफल नहीं हो पाए और मेंस में अटक गए। सूरज ने और जोरदार तैयारी की और 2017 की यूपीएससी की परीक्षा दी। इस बार वे सफल रहें। उन्होंने अपनी मेहनत और लगन के बदौलत ओवरऑल 117वीं रैंक हासिल की।

सबको न्याय दिलाने की लिए बनें हैं IPS अफसर

सूरज कहते हैं कि वे इस क्षेत्र में इसलिए आए हैं कि वे सभी को न्याय दिलवा सके, लोगो की सेवा कर सकें और औरों से कुछ अलग कर सकें। वे कहते हैं कि यूपीएससी क्लियर करने के लिए मायने ये नहीं रखता कि आप कितना घंटा पढ़ते हो, मायने ये रखता है की आप कितने कंसेप्ट क्लियर करते हो। हमारी पढ़ाई उसी के आधार पर होनी चहिए।

पुलिस के लापरवाह रूप से परेशान हुए

उन्होंने मीडिया को बताया कि जब वे अपने पिता के केस में कभी थाने तो कभी कोर्ट के चक्कर लगाया करते थे तब उन्होंने सरकार का बहुत धीमा और लचर रूप देखा। वह कहते हैं कि उनके जैसे हजारों लोग कभी थाने और कभी कोर्ट के ही चक्कर काटने में रह जाते हैं उन्हें बस तसल्ली दी जाती है कि उन्हें न्याय मिलेगा और केस दबकर रह जाता है। वे इस व्यवस्था को सुधारना चाहते थे इसीलिए उन्होंने सिविल सेवा में आने का निर्णय किया। इससे पहले उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि वे यूपीएससी की परीक्षा देंगे। समय और हालात ने उनकी राह बनाई।

Medha Pragati
Medha Pragati
मेधा बिहार की रहने वाली हैं। वो अपनी लेखनी के दम पर समाज में सकारात्मकता का माहौल बनाना चाहती हैं। उनके द्वारा लिखे गए पोस्ट हमारे अंदर नई ऊर्जा का संचार करती है।

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