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Monday, January 30, 2023

पंचर दुकान पर काम किया, दूसरों ने भरी फीस, कड़ी मेहनत करके बन गए IAS

समय और भाग्य दोनों परिवर्तनशील होते है। हमें अच्छे समय में अभिमान और बुरे समय में चिंता नही करना चाहिए। समय के साथ हमारे कर्म, हमारी इच्छा, आत्मविश्वास, मनोबल, प्रेरकशक्ति में परिवर्तन होता है। कर्मों के अनुसार हमारा भाग्य निर्मित होता है। परिश्रम से सफलता हासिल होती है। मन में विश्वास बन जाता है कि मेरा भाग्य अच्छा चल रहा है और असफलता मिलते ही भाग्य को कोसने लगते हैं। जीवन में अच्छे और बुरे दिन आते जाते रहते हैं। इसलिए अच्छे समय में न हीं अभिमानी और अहंकारी बने और न ही बुरे समय में हतोत्साहित और उदास होकर परिश्रम करना बंद कर दें।

समय के साथ भाग्य भी परिवर्तनशील होता है। आज बुरा समय है तो कल अच्छा समय आएगा धैर्य और विश्वास बनाए रखें, लगन और परिश्रम से कार्य करते हुए जीवन पथ पर आगे बढ़ते रहें। अच्छे फल की प्राप्ति होगी। आज हम एक ऐसे ही एक व्यक्ति के बारे में बताने जा रहे है जिन्होंने अपने परिश्रम के बल पर अपने भाग्य को बदल दिया। उसने पंचर के दुकान पर काम कर पढाई पूरी की, और कड़ी मेहनत और लगन से आज IAS बन गए।

वरुण बरनवाल कौन है ?

वरुण बरनवाल महाराष्ट्र के एक छोटे से शहर बोइसर के रहने वाले हैं और 2013 में हुई UPSC की परीक्षा में 32th स्थान हासिल किया। इनकी कहानी आम कहानी जैसी नहीं है। वरुण की जिंदगी में उनकी मां, दोस्त और रिश्तेदारों का अहम योगदान है।

आर्थिक स्थिति खराब होते हुए भी जारी रखी पढ़ाई।

वरुण ने अपना बचपन अत्यंत ही गरीबी में जिया है। उन्हें पढ़ाई करना बहुत पसंद था। पर पढ़ाई करने के लिए उनके पास पैसे नहीं थे। वरुण बरनवाल ने 10वीं की पढ़ाई पूरी की। आगे की पढ़ाई करने के लिए उनके पास पैसे नहीं थे इसलिए उन्होंने एक साइकिल की दुकान में पंक्चर बनाने का काम करना शुरू कर दिया। वरुण बरनवाल ने 2006 में 10वीं के परीक्षा दी और परीक्षा देने के तीन दिन बाद उनके पिता की मृत्यु हो गई। जिससे उन्हें लगा कि अब वह पढ़ाई छोड़ दें लेकिन जब 10 वीं का रिजल्ट आया तो उन्होंने पूरे स्कूल में टॉप किया। इस संघर्ष में उनके परिवार वालों का योगदान अतुलनीय है। उनकी मां ने उनसे कहा कि वह पढ़ाई पर ध्यान दें, बाकी का काम घरवाले मिलकर संभाल लेंगे।

कुछ समय कठिनाई में बीता।

वो कहते है कि जिंदगी में कभी धूप तो कभी छाँव लगा रहता है। अंधेरा के बाद उजाला आता ही है। वरुण जब 11वीं-12वीं में थे तब वह साल उनका काफी मुश्किल साल रहा। वह सुबह 6 बजे उठकर स्कूल जाते थे और 2 बजे से रात 10 बजे तक ट्यूशन लेते थे। फिर उसके बाद दुकान का काम देखते थे।

नहीं थे फीस के पैसे, यहां से मिली मदद।

10वीं में नामांकन के लिए वरुण के घर के पास एक ही अच्छा स्कूल था। लेकिन उसमें नामांकन लेने के लिए 10 हजार रुपये डोनेशन लगते थे।जिसके बाद उन्होंने अपने मां से कहा की वह नामांकन नही लेंगे ,उन्होंने कहा कि वह 1 साल तक रुक जाऐंगे। अगले साल दाखिला ले लेंगे, लेकिन उनके पिता का जो इलाज करते थे, वह डॉक्टर उनके दुकान के बाहर से जा रहे थे। जिसके बाद उन्होंने उनसे सारी बात पूछी और फिर तुरंत 10 हजार रुपये निकाल कर दिए और कहा जाओ दाखिला करवा लो।

पढ़ाई के दौरान सभी ने सहयोग किया।

हर मोड़ पर वरुण का किस्मत उनके साथ था। वरुण खुद को बड़ा किस्मत वाला भी मानते हैं। उन्होंने बताया उन्होंने कभी 1 रुपये भी अपनी पढ़ाई पर खर्च नहीं किया है। कोई न कोई उनके किताबों, फॉर्म, फीस भर दिया करता था। उनकी शुरुआती फीस तो डॉक्टर ने भर दी, लेकिन इसके बाद टेंशन ये थी स्कूल की हर महीने की फीस कैसे वो देंगे। जिसके बाद उन्होंने सोच लिया अच्छे से वह पढ़ाई करेंगे और फिर स्कूल के प्रिंसिपल से रिक्वेस्ट करेंगे कि मेरी फीस माफ कर दें। और हुआ भी यही, उन्होंने बताया घर की स्थिति देखते हुए उनके दो साल की पूरी फीस उनके शिक्षक ने दी।

UPSC की तैयारी शुरु की।

वरुण की प्लेसमेंट तो काफी अच्छी हो गई थी। काफी कंपनी के नौकरी के ऑफर उनके पास थे, लेकिन तब तक वरुण ने सिविल सर्विसेज परीक्षा देने का मन बना लिया था। वरुण ने मन तो बना लिया था लेकिन समझ नहीं आ रहा था कि वह तैयारी कैसे करें। जिसके बाद उनकी मदद उनके भइया ने की, जब यूपीएससी प्रिलिम्स का रिजल्ट आया तो उन्होंने भइया से पूछा कि मेरी रैंक कितनी आई है- जिसके बाद उन्होंने कहा 32 ,ये सुनकर वरुण की आंखों में आंसू आ गए हैं। उन्हें यकीन था अगर मेहनत और लगन सच्ची हो बिना पैसों के भी आप दुनिया का हर मुकाम हासिल कर सकते हैं।

Medha Pragati
Medha Pragati
मेधा बिहार की रहने वाली हैं। वो अपनी लेखनी के दम पर समाज में सकारात्मकता का माहौल बनाना चाहती हैं। उनके द्वारा लिखे गए पोस्ट हमारे अंदर नई ऊर्जा का संचार करती है।

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